इतिहास
यह इतिहास प्रकाशित विवरणों और स्थानीय परंपराओं से तैयार किया गया है। जहाँ स्रोत अलग-अलग हैं, वहाँ दोनों मत दिए गए हैं। रौज़े की कमेटी इस लेख की समीक्षा कर रही है।
समाना क़स्बा
समाना ज़िला पटियाला, पंजाब का एक प्राचीन क़स्बा और नगर परिषद है, जो पटियाला और पातड़ां के बीच स्टेट हाईवे 10 पर स्थित है। इस क्षेत्र का उल्लेख राजा जयपाल के समय के विवरणों में मिलता है, और मुहम्मद ग़ोरी की विजयों के बाद 1192 में इसे क़ुतुबुद्दीन ऐबक को सौंपा गया। बादशाह अकबर के समय आईन-ए-अकबरी में समाना को सरहिंद सरकार का एक परगना दर्ज किया गया है।
सदियों तक समाना संतों और विद्वानों के क़स्बे के रूप में जाना जाता रहा, और 1947 तक यहाँ कई सैयद परिवार और शिया विद्वान बसे हुए थे। स्थानीय परंपरा के अनुसार क़स्बे का नाम समाना नाम की एक नेक बीबी के नाम पर है, जिनका संबंध इमामों के ख़ानदान से बताया जाता है; यह एक परंपरा है और पुराने स्रोतों में दर्ज नहीं है।
इमामज़ादा सैयद मशहद अली
यह रौज़ा इमामज़ादा सैयद मशहद अली की आरामगाह माना जाता है। परंपरा के अनुसार वे अब्बासी ख़लीफ़ा मामून के समय, जब इमामों के ख़ानदान पर कठिन समय था, ख़ुरासान के शहर मशहद से इस क्षेत्र में आए।
उनकी वंशावली के बारे में विवरण अलग-अलग हैं। कुछ उन्हें हज़रत इमाम अली रज़ा (अलैहिस्सलाम) का पुत्र, कुछ इमाम की बाद की पीढ़ी से, और कुछ हज़रत इमाम मुहम्मद तक़ी (अलैहिस्सलाम) का पुत्र बताते हैं। [कमेटी बताई जाने वाली वंशावली की पुष्टि करे]
रौज़ा और उसका शिलालेख
लंबे समय तक यह मज़ार केवल पंज पीर मज़ार के नाम से जाना जाता था। लाहौर हाई कोर्ट के जस्टिस शब्बर रिज़वी के सुझाव पर, जिनका परिवार विभाजन से पहले समाना में बसा था, जब रौज़े के अहाते की सफ़ाई की गई तो एक फ़ारसी शिलालेख सामने आया।
बताए अनुसार इस शिलालेख में इस मज़ार को इमाम मशहद अली का मज़ार कहा गया है और दर्ज है कि यह इमारत अजरुद्दीन ख़ान मुग़ल, पुत्र बख़्श अल्लाह ख़ान, ने रमज़ान के महीने 967 हिजरी में, बादशाह अकबर के शासन के चौथे वर्ष में बनवाई। यह लगभग 1560 ई. बनता है; कुछ विवरणों में 1559 दर्ज है।
बताया जाता है कि इस शिलालेख के पाठ की जाँच धार्मिक विद्वानों, इतिहासकारों और आए हुए अधिकारियों ने की। इसका कोई प्रकाशित विद्वत्तापूर्ण पाठ अभी तक नहीं मिला है। [कमेटी शिलालेख का पूरा पाठ, अनुवाद और तस्वीर शामिल करे]
1947 के बाद
1947 के विभाजन के समय समाना के कई सैयद परिवार पाकिस्तान चले गए। रौज़ा अपनी जगह क़ायम रहा, और हाल के वर्षों में यह फिर से शिया और सुन्नी मुसलमानों और सिख श्रद्धालुओं के लिए ज़ियारतगाह बन गया है। मशहद-ए-हिंद में हर साल एक सालाना मजलिस होती है।
स्रोत
- विकिपीडिया, "Samana, India" (इतिहास भाग, आईन-ए-अकबरी की प्रविष्टि सहित)।
- mashadehind.in, "About Samana"।
- वी. एस. गिल, "Imami Shrine at Samana: Most Noteworthy and Neglected", हेरिटेज गुरु ब्लॉग, 2014।
- समाना वासियों की मौखिक परंपराएँ।